नागार्जुन
Nagarjun
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नागार्जुन

नागार्जुन (30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वह हिन्दी और मैथिली के लेखक और कवि थे। वह अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार थे । उन्होंने संस्कृत एवं बाङ्ला में भी मौलिक रचनाएँ कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया । साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन ने हिन्दी साहित्य में नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। काशी में रहते हुए उन्होंने 'वैदेह' उपनाम से भी कविताएँ लिखी थीं। सन् १९३६ में सिंहल में 'विद्यालंकार परिवेण' में ही 'नागार्जुन' नाम ग्रहण किया। उनकी रचनाएँ हैं; कविता-संग्रह: युगधारा -१९५३, सतरंगे पंखोंवाली -१९५९, प्यासी पथराई आँखें -१९६२, तालाब की मछलियाँ -१९७४, तुमने कहा था -१९८०, खिचड़ी विप्लव देखा हमने -१९८०, हज़ार-हज़ार बाहों वाली -१९८१, पुरानी जूतियों का कोरस -१९८३, रत्नगर्भ -१९८४, ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!! -१९८५, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने -१९८६, इस गुब्बारे की छाया में -१९९०, भूल जाओ पुराने सपने -१९९४, अपने खेत में -१९९७; प्रबंध काव्य: भस्मांकुर -१९७०, भूमिजा; उपन्यास: रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नयी पौध -१९५३, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे, दुखमोचन, कुंभीपाक/चम्पा, हीरक जयन्ती/अभिनन्दन, उग्रतारा, जमनिया का बाबा, गरीबदास; संस्मरण: एक व्यक्ति: एक युग; कहानी संग्रह: आसमान में चन्दा तैरे -१९८२ । मैथिली कविता-संग्रह: चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ, पका है यह कटहल ।


हज़ार-हज़ार बाँहों वाली नागार्जुन

भारतीय जनकवि का प्रणाम
सच न बोलना
पुलिस अफ़सर
मैं कैसे अमरित बरसाऊँ
उनको प्रणाम
कल और आज
नया तरीका
चमत्कार
कर दो वमन !
बातें
बेतवा किनारे-1
बेतवा किनारे-2
अभी-अभी हटी है
हमने तो रगड़ा है
प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है
पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने
कल्पना के पुत्र हे भगवान
तिकड़म के ताऊ
पीपल के पीले पत्ते
करवटें लेंगे बूँदों के सपने
छेड़ो मत इनको !
वह तो था बीमार
नाहक ही डर गई, हुज़ूर
ख़ूब फँसे हैं नंदा जी
बाकी बच गया अण्डा

युगधारा नागार्जुन

बादल को घिरते देखा है
प्रेत का बयान
भुस का पुतला
बरफ पड़ी है
भारतमाता
खाली नहीं और खाली
ऋतु-सन्धि

सतरंगे पंखोंवाली नागार्जुन

सतरंगे पंखोंवाली
यह कैसे होगा ?
तन गई रीढ़
यह तुम थीं
देखना ओ गंगा मइया
खुरदरे पैर
नाकहीन मुखड़ा
बहुत दिनों के बाद
क्या अजीब नेचर पाया है
तुम किशोर, तुम तरुण
होतीं बस आँखें ही आँखें
अकाल और उसके बाद
वसंत की अगवानी
नीम की दो टहनियाँ
कालिदास
सिंदूर तिलकित भाल
यह दंतुरित मुसकान
ओ जन-मन के सजग चितेरे

खिचड़ी विप्लव देखा हमने नागार्जुन

तुम तो नहीं गईं थीं आग लगाने
इन्दु जी क्या हुआ आपको
लाइए, मैं चरण चूमूं आपके
बाघिन
फिसल रही चांदनी
जाने, तुम कैसी डायन हो
इसके लेखे संसद-फंसद सब फिजूल है
सत्य
अहिंसा
चंदू, मैंने सपना देखा
लालू साहू
प्रतिबद्ध हूँ
हाथ लगे आज पहली बार
सुबह-सुबह
वसन्त की अगवानी
इन सलाखों से टिकाकर भाल
होते रहेंगे बहरे ये कान जाने कब तक
हरे-हरे नए-नए पात
तीस साल के बाद...
तुनुक मिजाजी नही चलेगी
थकित-चकित-भ्रमित-भग्न मन
नए सिरे से
धोखे में डाल सकते हैं
ख़ूब सज रहे
हाय अलीगढ़
देवरस-दानवरस
क्रान्ति सुगबुगाई है
हरिजन गाथा

इस गुब्बारे की छाया में नागार्जुन

महादैत्य का दुःस्वप्न
इस गुब्बारे की छाया में
गुपचुप हजम करोगे
लोकतंत्र के मुंह पर ताला
अंह का शेषनाग
वाह पाटलिपुत्र !
अभी-अभी उस दिन
भारत भाग्य विधाता
छतरी वाला जाल छोड़कर
भारत-पुत्री नगरवासिनी
मुबारक हो नया साल
गुड़ मिलेगा

अपने खेत में नागार्जुन

अपने खेत में
शनीचर भगवान
प्रीतिभोज
तेरे दरबार में क्या चलता है ?
चलते-फिरते पहाड़
घिन तो नहीं आती है ?

भूल जाओ पुराने सपने नागार्जुन

भूल जाओ पुराने सपने
स्वगत : अपने को संबोधित
इतना भी काफी है !
कैसे रहा जाएगा...
आइए हुजूर
लाठी-गोली आबाद रहे
साँस खींचो
अपना यह देश है महाऽऽन
जपाकर
इतना भी क्‍या कम है प्यारे
तुमको केत्ता मिला है
तुम्हें नींद नहीं आती
तेरा क्या-क्या होगा ?
ऊर्जा हमारी अखूट-असीम

पुरानी जूतियों का कोरस नागार्जुन

लो, देखो अपना चमत्कार !
इतनी जल्दी भूल गया ?
भारतेन्दु
भगतसिंह

रत्नगर्भ नागार्जुन

महाभिनिष्क्रमण से पूर्व

मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा नागार्जुन

अचानक हुआ भाग्योदय
सभी कहते उसे सन्त महाराज
निर्लज्ज नाटक
यह रथ
भगौड़े शिशिर का पुनरागमन
प्यार का आदान-प्रदान
छल का नाम गन्ध भी कहाँ
विप्लव विलास
मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा
भुतहा पेड़ इमली का
दीप्त सीमन्त
रहता उद्यत
युग-पुरुष

आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने नागार्जुन

सबके लेखे सदा सुलभ
बार-बार हारा है
संग तुम्हारे, साथ तुम्हारे
सुन रहा हूँ
बाघ आया उस रात
जंगल में
ध्यानमग्न वक-शिरोमणि
इन घुच्ची आँखों में
फुहारों वाली बारिश
कोहरे में शायद न भी दीखे
रातोंरात भिगो गए बादल

विविध कविताएँ नागार्जुन

मोर न होगा ...उल्लू होंगे
गुलाबी चूड़ियाँ
मेरी भी आभा है इसमें
शासन की बंदूक
अग्निबीज
भोजपुर
जान भर रहे हैं जंगल में
मेघ बजे
घन-कुरंग
फूले कदंब
अन्न पचीसी के दोहे
तीनों बन्दर बापू के
भूले स्वाद बेर के
आओ रानी
मंत्र कविता
जी हाँ , लिख रहा हूँ
सोनिया समन्दर
शैलेन्द्र के प्रति
फसल
विज्ञापन सुंदरी
मनुपुत्र दिगंबर
उषा की लाली
 
 
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