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नज़ीर अकबराबादी
Nazeer Akbarabadi
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Poetry in Hindi Nazeer Akbarabadi

नज़ीर अकबराबादी

नज़ीर अकबराबादी (१७३५-१८३०), जिन का असली नाम वली मुहम्मद था, को उर्दू 'नज़्म का पिता' करके जाना जाता है । वह आम लोगों के कवि थे । उन्होंने आम जीवन, ऋतुयों, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर लिखा । वह धर्म-निरपेक्षता की ज्वलंत उदाहरण हैं । कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो लाख रचनायें लिखीं । परन्तु उनकी छह हज़ार के करीब रचनायें मिलती हैं और इन में से ६०० के करीब ग़ज़लें हैं।


नज़्में (कविताएं) नज़ीर अकबराबादी

आदमी नामा
आरसी
आशिक़ों की भंग
इश्क़ अल्लाह
इश्क़ की मस्ती
ईद-यूँ लब से अपने निकले है अब बार-बार आह
ईद-शाद था जब दिल वह था और ही ज़माना ईद का
ईद उल फ़ितर
ईश्वर-वन्दना
किस्सा लैला मजनूँ
क्या कहें आलम में हम इन्सान या हैवान थे
ख़ुशामद
गुरू नानक शाह
जाड़े की बहारें
ज़ुल्फ़ के फन्दे
झोंपड़ा
दरसनाए-पैग़म्बरे-ख़ुदा
दीवाली
पहुँची
पेट
पैसा-पैसे ही का अमीर के दिल में खयाल है
पैसा-नक़्श याँ जिस के मियाँ हाथ लगा पैसे का
फ़क़ीरों की सदा
फ़ना
बचपन
बटमार अजल का आ पहुँचा
बरसात की बहारें
बसंत-आलम में जब बहार की आकर लगंत हो
बसंत-जहां में फिर हुई ऐ ! यारो आश्कार बसंत
बसंत-फिर आलम में तशरीफ लाई बसंत
बंजारानामा
बालपन-बाँसुरी बजैया का
महादेव जी का ब्याह
मुफ़्लिसी
राखी
रीछ का बच्चा
रोटियाँ
शब-बरात
शहरे आशोब (शहर आगरा की दुर्दशा)
श्री कृष्ण जी की तारीफ़ में
शेख़ सलीम चिश्ती
है दुनिया जिस का नाम मियाँ-दार-उल-मकाफ़ात
होली की बहार
होली-जब खेली होली नंद ललन
होली-जब फागुन रंग झमकते हों
होली पिचकारी
होली-बजा लो तब्लो तरब इस्तमाल होली का
होली-बुतों के ज़र्द पैराहन में इत्र चम्पा जब महका
होली-हुआ जो आके निशाँ आश्कार होली का

ग़ज़लें नज़ीर अकबराबादी

अदा-ओ-नाज़ में कुछ कुछ जो होश उस ने सँभाला है
अव्वलन उस बे-निशाँ और बा-निशाँ को इश्क़ है
अंदाज़ कुछ और नाज़-ओ-अदा और ही कुछ है
आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का
आज तो हमदम अज़्म है ये कुछ हम भी रस्मी काम करें
आन रखता है अजब यार का लड़ कर चलना
आया नहीं जो कर कर इक़रार हँसते हँसते
इधर यार जब मेहरबानी करेगा
इश्क़ का मारा न सहरा ही में कुछ चौपट पड़ा
इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने है
इंकार हम से ग़ैर से इक़रार बस जी बस
ईसा की क़ुम से हुक्म नहीं कम फ़क़ीर का
उधर उस की निगह का नाज़ से आ कर पलट जाना
उस के बाला है अब वो कान के बीच
उस के शरार-ए-हुस्न ने शोला जो इक दिखा दिया
उसी का देखना है ठानता दिल
उसी की ज़ात को है दाइमन सबात-ओ-क़याम
ऐ दिल अपनी तू चाह पर मत फूल
ऐ मिरी जान हमेशा हो तिरी जान की ख़ैर
ऐ सफ़-ए-मिज़्गाँ तकल्लुफ़ बर-तरफ़
ऐश कर ख़ूबाँ में ऐ दिल शादमानी फिर कहाँ
क़त्ल पर बाँध चुका वो बुत-ए-गुमराह मियाँ
क़स्र-ए-रंगीं से गुज़र बाग़-ओ-गुलिस्ताँ से निकल
कई दिन से हम भी हैं देखे उसे हम पे नाज़ ओ इताब है
कब ग़ैर ने ये सितम सहे चुप
कभी तो आओ हमारे भी जान कोठे पर
कर लेते अलग हम तो दिल इस शोख़ से कब का
कल नज़र आया चमन में इक अजब रश्क-ए-चमन
कल मिरे क़त्ल को इस ढब से वो बाँका निकला
कहते हैं जिस को नज़ीर सुनिए टुक उस का बयाँ
कहते हैं याँ कि मुझ सा कोई महजबीं नहीं
कहने उस शोख़ से दिल का जो मैं अहवाल गया
कहा जो हम ने “हमें दर से क्यूँ उठाते हो”
कहा था हम ने तुझे तो ऐ दिल कि चाह की मय को तू न पीना
कहा ये आज हमें फ़हम ने सुनो साहिब
किधर है आज इलाही वो शोख़ छलबलिया
किस के लिए कीजिए जामा-ए-दीबा-तलब
किसी ने रात कहा उस की देख कर सूरत
की तलब इक शह ने कुछ पंद अज़-हकीम-ए-नुक्ता-दाँ
कौन याँ साथ लिए ताज-ओ-सरीर आया है
क्या अदा किया नाज़ है क्या आन है
क्या कासा-ए-मय लीजिए इस बज़्म में ऐ हम-नशीं
क्या दिन थे वो जो वाँ करम-ए-दिल-बराना था
क्या नाम-ए-ख़ुदा अपनी भी रुस्वाई है कम-बख़्त
ख़याल-ए-यार सदा चश्म-ए-नम के साथ रहा
खींच कर इस माह-रू को आज याँ लाई है रात
खोली जो टुक ऐ हम-नशीं उस दिल-रुबा की ज़ुल्फ़ कल
गर ऐश से इशरत में कटी रात तो फिर क्या
गर हम ने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्या
गर्म यां यूं तो बड़ा हुस्न का बाज़ार रहा
गले से दिल के रही यूँ है ज़ुल्फ़-ए-यार लिपट
गुलज़ार है दाग़ों से यहॉ तन बदन अपना
चाहत के अब इफ़शा-कुन-ए-असरार तो हम हैं
चाह में उस की दिल ने हमारे नाम को छोड़ा नाम किया
चितवन की कहूँ कि इशारात की गर्मी
चितवन दुरुस्त सीन बजा बातें ठीक-ठीक
चितवन में शरारत है और सीन भी चंचल है
जब आँख उस सनम से लड़ी तब ख़बर पड़ी
जब उस का इधर हम गुज़र देखते हैं
जब उस की ज़ुल्फ़ के हल्क़े में हम असीर हुए
जब उस के ही मिलने से नाकाम आया
जब मैं सुना कि यार का दिल मुझ से हट गया
जब हम-नशीं हमारा भी अहद-ए-शबाब था
जाम न रख साक़िया शब है पड़ी और भी
जाल में ज़र के अगर मोती का दाना होगा
जिन दिनों हम को उस से था इख़्लास
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
जो आवे मुँह पे तिरे माहताब है क्या चीज़
जो कुछ है हुस्न में हर मह-लक़ा को ऐश-ओ-तरब
जो तुम ने पूछा तो हर्फ़-ए-उल्फ़त बर आया
जो दिल को दीजे तो दिल में ख़ुश हो करे है किस किस तरह से हलचल
जो पूछा मैं ने याँ आना मिरा मंज़ूर रखिएगा
ज़ाहिदो रौज़ा-ए-रिज़वाँ से कहो इश्क़ अल्लाह
झमक दिखाते ही उस दिल-रुबा ने लूट लिया
तदबीर हमारे मिलने की जिस वक़्त कोई ठहराओगे तुम
तन पर उस के सीम फ़िदा और मुँह पर मह दीवाना है
तने-मुर्दा को क्या तकल्लुफ़ से रखना-क़िता
तिरी क़ुदरत की क़ुदरत कौन पा सकता है क्या क़ुदरत
तिरे मरीज़ को ऐ जाँ शिफ़ा से क्या मतलब
तुझे कुछ भी ख़ुदा का तर्स है
तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब
तू ही न सुने जब दिल-ए-नाशाद की फ़रियाद
तेरे भी मुँह की रौशनी रात गई थी मह से मिल
थी छोटी उस के मुखड़े पर कल
थे आगे बहुत जैसे कि ख़ुश यार हमीं से
दरिया ओ कोह ओ दश्त ओ हवा अर्ज़ और समा
दामान-ओ-कनार अश्क से कब तर न हुए आह
दिखाई जब तेरे मुखड़े ने आ झलक पै झलक
दिया जो साक़ी ने साग़र-ए-मय दिखा के आन इक हमें लबालब
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
दिल को ले कर हम से अब जाँ भी तलब करते हैं आप
दिल ठहरा एक तबस्सुम पर कुछ और बहा ऐ जान नहीं
दिल यार की गली में कर आराम रह गया
दिल हम ने जो चश्म-ए-बुत-ए-बेबाक से बाँधा
दिल हर घड़ी कहता है यूँ जिस तौर से अब हो सके
दुनिया है इक निगार-ए-फ़रीबंदा जल्वा-गर
दूर से आए थे साक़ी सुन के मयख़ाने को हम
देख कर कुर्ते गले में सब्ज़ धानी आप की
देख ले जो आलम उस के हुस्न-ए-बाला-दस्त का
दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है
धुआँ कलेजे से मेरे निकला जला जो दिल बस कि रश्क खा कर
न उस के नाम से वाक़िफ़ न उस की जा मालूम
नज़र पडा इक बुत-ए-परी-वश निराली सज-धज नई अदा का
न टोको दोस्तो उस की बहार नाम-ए-ख़ुदा
न दिल में सब्र न अब दीदा-ए-पुर-आब में ख़्वाब
न मैं दिल को अब हर मकाँ बेचता हूँ
न लज़्ज़तें हैं वो हँसने में और न रोने में
न सुर्खी गुंचा-ए-गुल में तेरे दहन की सी
नहीं हवा में ये बू नाफ़ा-ए-ख़ुतन की सी
नामा-ए-यार जो सहर पहुँचा
निकले हो किस बहार से तुम ज़र्द-पोश हो
निगह के सामने उस का जूँही जमाल हुआ
नीची निगह की हम ने तो उस ने
पाया मज़ा ये हम ने अपनी निगह लड़ी का
बगूले उठ चले थे और न थी कुछ देर आँधी में
ब-हसबे-अकल तो कोई नहीं सामान मिलने का
भरे हैं उस परी में अब तो यारो सर-ब-सर मोती
मानी ने जो देखा तिरी तस्वीर का नक़्शा
मियाँ दिल तुझे ले चले हुस्न वाले
मुंतज़िर उस के दिला ता-ब-कुजा बैठना
ये कहते हैं कि आशिक छूट जाता है अज़ीयत से-क़िता
ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है
ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है
रुख़ परी चश्म परी ज़ुल्फ़ परी आन परी
वो मुझको देख कुछ इस ढब से शर्मसार हुआ
वो रश्के-चमन कल जो ज़ेबे-चमन था
शब-ए-मह में देख उस का वो झमक झमक के चलना
हंसे, रोये, फिरे रुसवा हुए, जाके बंधे, छूटे
हो क्यूँ न तिरे काम में हैरान तमाशा

Poetry in Hindi Nazeer Akbarabadi

Aadami Nama
Aarsi
Aashiqon Ki Bhang
Baalpan-Bansuri Bajayiya Ka
Bachpan
Banjara Nama
Barsaat Ki Baharein
Basant-Aalam Mein Jab Bahar Ki
Basant-Jahan Mein Phir Hui Ai Yaaro
Basant-Phir Aalam Mein Tashreef Laai Basant
Batmar Ajal Ka Aa Pahuncha
Dar-sana-e-Paighambar-e-Khuda
Diwali
Eid-Shad Tha Jab Dil
Eid-Yun Lab Se Apne Nikle Hai
Fanah
Faqiron Ki Sada
Guru Nanak Shah
Hai Duniya Jis Ka Naam Miyan
Holi-Baja Lo Tablo Tarab
Holi-Buton Ke Zard Pairahan Mein
Holi-Hua Jo Aake Nishan
Holi Ki Bahar
Holi-Jab Phagun Rang Jhamakte Hon
Holi Pichkari
Holi-Jab Kheli Holi Nand Lalan
Id-ul-Fitr
Ishq Allah
Ishq Ki Masti
Ishwar Vandana
Jaare/Jaade Ki Baharein
Jhompra
Kaya Kahein Ham Aalam Mei Insaan The
Khushamad
Mahadev Ji Ka Byah
Muflisi
Pahunchi
Paisa-Paise Ka Hi Amir Ke Dil Mein
Paisa-Yan Naqsh Jis Ke Miyan Haath Laga
Pet
Raakhi
Reechh Ka Bachcha
Rotiyan
Shab-Barat
Shehar-e-Aashob-Agra Ki Buri Haalat Par
Sheikh Salim Chishti
Shri Krishan Ji Ki Tareef Mein
Zulf Ke Fande

Ghazals in Hindi Nazeer Akbarabadi

Aagosh-e-Tassavur Mein Jab Maine
Aaj To Hamdam Azm Hai Yeh
Aan Rakhta Hai Ajab Yaar Ka
Aaya Nahin Jo Kar Kar Iqrar
Andaz Kuchh Aur Naaz-o-Ada Aur
Ada-o-Naaz Mein Kuchh Kuchh
Ai Dil Tu Apni Chah Par
Ai Meri Jaan Hamesha Ho
Ai Saf-e-Mizghan Taqalluf
Aish Kar Khooban Mein Ai Dil
Avvalan Us Benishan Aur Banishan
Chahat Ke Ab Ifsha-Kun-e-Asrar
Chah Mein Uski Dil Ne Hamare
Chitvan Darust Seen Baja Batein
Chitvan Ki Kahoon Ki Ishrat Ki Garmi
Chitvan Mein Shararat Hai
Daman-o-Kanar Ashq Se Kab Tar Na Hue
Darya O Koh O Dasht O Hawa
Dekh Kar Kurte Gale Mein Sabz Dhaani
Dekh Le Jo Aalam Uske Husn-e-Bala-Dast Ka
Dhuan Kaleje Se Mere Nikla Jala Jo Dil
Dikhayi Jab Tere Mukhre Ne Aa Jhalak Pai Jhalak
Dil Ko Chasm-e-Yaar Ne Jab
Dil Ko Le Kar Ham Se
Dil Hamne Jo Chasm-e-But-e-Bebak Se Bandha
Dil Har Ghari Kehta Hai Yun
Dil Thahra Ek Tabassum Par
Dil Yaar Ki Gali Mein Kar Aaram Reh Gaya
Diya Jo Saqi Ne Sagar-o-May Dikha Ke
Door Se Aaye The Saqi
Dosto Kya Kya Diwali Mein
Dunya Hai Ik Nigar-e-Faribanda Jalwagar
Galey Se Dil Ke Rahi Yoon Hai
Gar Aish Se Ishrat Mein Kati Raat
Gar Hamne Dil Sanam Ko Diya Phir Kisi Ko Kya
Garm Yaan Yun To Bara Husn Ka Bazaar Raha
Gulzar Hai Daghon Se Yahan Tan Badan Apna
Idhar Yaar Jab Meharbani Karega
Inqar Ham Se Ghair Se Iqrar
Isa Ki Qum Se Hukm Nahin
Ishq Ka Mara Na Sehra Hi Mein
Ishq Phir Rang Vo Laya Hai Ki Ji Jaane Hai
Jaal Mein Zar Ke Agar Moti Ka Dana Hoga
Jaam Na Rakh Saqia Shab Hai Pari
Jab Aankh Us Sanam Se Lari
Jab Ham-Nashin Hamara Bhi Ahad-e-Shabab Tha
Jab Main Suna Ki Yaar Ka Dil
Jab Uska Idhar Ham Guzar Dekhte Hain
Jab Uske Hi Milne Se Nakam Aaya
Jab Uski Zulf Ke Halqe Mein
Jhamak Dikhate Hi Us Dilruba Ne Loot Liya
Jin Dino Hamko Us Se Tha Ikhlaas
Jo Aave Munh Par Tere Mahtaab
Jo Dil Ko Dije To Dil Mein Khush Ho Kare Hai
Jo Kuchh Hai Husn Mein Har Mah-laqa Ko
Jo Poochha Maine Yaan Aana Mira
Jo Tumne Poochha To Harf-e-Ulfat Bar Aaya
Juda Kisi Se Kisi Ka Gharaz Habib Na Ho
Kab Ghair Ne Yeh Sitam Sahe Chup
Kabhi To Aao Hamare Bhi Jaan Kothe Par
Kaha Jo Hamne Hamein Dar Se
Kaha Tha Hamne Tujhe To Ai Dil
Kaha Yeh Aaj Hamein Faham Ne
Kal Mere Qatl Ko Is Dhab Se
Kal Nazar Aaya Chaman Mein Ik Ajab Rashk-e-Chaman
Kar Lete Alag Ham To Dil
Kaun Yaan Saath Liye Taaj-o-Sarir Aaya Hai
Kayi Din Se Ham Bhi Hain Dekhe
Kehne Us Shokh Se Dil Ka Jo Main
Kehte Hain Jisko Nazeer
Kehte Hain Yaan Ki Mujhsa Koi
Khayal-e-Yaar Sada Chasm-e-Nam Ke Saath Raha
Kheench Kar Is Maah-Ru Ko Aaj
Kholi Jo Tuk Ai Ham-Nashin
Kidhar Hai Aaj Ilahi Vo
Kis Ke Liye Kijiye Jama-e-Deeba Talab
Kisi Ne Raat Kaha Uski Dekh Kar Surat
Ki Talab Ik Shah Ne Kuchh
Kya Din The Vo Jo Vaan
Kya Ada Kiya Naaz Hai
Kya Kasa-e-May Lijiye
Kya Naam-e-Khuda Apni Bhi
Na Dil Mein Sabar
Nahin Hawa Mein Ye Bu Nafa-e-Khutan Ki Si
Na Lazztein Hain Vo Hansne Mein
Nama-e-Yaar Jo Sahar Pahuncha
Na Main Dil Ko Ab Har Makan Bechta Hoon
Na Surkhi Guncha-o-Gul Mein
Na Toko Dosto Uski Bahar
Na Uske Naam Se Waqif
Nazar Para Ik But-e-Pari-Vash
Neechi Nigah Ki Hamne
Nigah Ke Saamne Uska Junhi Jamal Hua
Nikle Ho Kis Bahar Se
Qasar-e-Rangin Se Guzar
Qatl Par Baandh Chuka Vo
Tadbir Hamare Milne Ki Jis Waqt Koyi
Tane-Murda Ko Kya Takalluf Se Rakhna-Qita
Tan Par Uske Seem Fida
Tere Munh Ki Raushni Raat Gayi Thi Mah Se Mil
The Aage Bahut Jaise Ki Khush Yaar Hamin Se
Thi Chhoti Uske Mukhre Par Kal
Tire Mareez Ko Ai Jaan Shifa Se Kya Matlab
Tiri Kudrat Ki Kudrat Kaun Pa Sakta Hai
Tu Hi Na Sune Jab Dil-e-Nashad Ki Faryad
Tujhe Kuchh Bhi Khuda Ka Tars Hai
Tumhare Haath Se Kal Ham Bhi Ro Liye Sahib
Udhar Us Ki Nigah Ka Naaz Se
Us Ke Bala Hai
Us Ke Sharar-e-Husn Ne Shola Jo Ik Dikha Diya
Usi Ka Dekhna Hai Thanta Dil
Usi Ki Zaat Ko Hai Daiman
Zahido Rauza-e-Rizwan Se Kaho
Paya Maza Yeh Hamne Apni Nigah Lari Ka
Bagoole Uth Chale The
Ba-Hasbe-Aql To Koi Nahin Samaan Milne Ka
Bhare Hain Us Pari Mein Ab To Yaro
Maani Ne Jo Dekha Teri Tasvir Ka Naqsha
Miyan Dil Tujhe Le Chale Husn Wale
Muntzir Uske Dila Ta-Ba-Kuja Baithna
Yeh Kehte Hain Ki Aashiq Chhoot Jata Hai Aziyat Se
Yeh Chhapke Ka Jo Baala Kaan Mein
Yeh Husn Hai Aah Ya Qayamat
Rukh Pari Chashm Pari Zulf Pari Aan Pari
Vo Mujhko Dekhkar Kuchh Is Dhab Se Sharamsar Hua
Vo Rashke-Chaman Jo Zebe-Chaman Tha
Shab-e-Mah Mein Dekh Us Ka Wo Jhamak Jhamak Ke Chalna
Hanse Roye Phire Ruswa Huye Jaake Bandhe Chhoote
Ho Kyun Na Tere Kaam Mein Hairan Tamasha
 
 
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