पदावली : संत मीरा बाई (भाग-9)

Padavali : Sant Meera Bai (Part-9)

1. हमरे चीर दे बनवारी

हमरे चीर दे बनवारी॥टेक॥
लेकर चीर कदंब पर बैठे। हम जलमां नंगी उघारी॥१॥
तुमारो चीर तो तब नही। देउंगा हो जा जलजे न्यारी॥२॥
ऐसी प्रभुजी क्यौं करनी। तुम पुरुख हम नारी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। तुम जीते हम हारी॥४॥

2. हमारे मन राधा स्याम बनी

हमारे मन राधा स्याम बनी।।टेक।।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनासी।
खोल के घूँघट प्यार के गाती, हरि ढिग नाचत गासी।
वृन्दावन की कुँज गलिन में, भाल तिलक उर लासी।
विष को प्याला राणा जी भेज्याँ, पीवत मीराँ हांसी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, भक्ति, मार्ग में फाँसी।।

(ढिग=पास, गासी=गाती है, उर=हृदय, लासी=
लगाती है, हाँसी=हँसकर, फाँसी=फँस गई)

3. हमारो प्रणाम बांकेबिहारी को

हमारो प्रणाम बांकेबिहारी को।
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे, कुंडल अलका कारी को॥
अधर मधुर पर बंसी बजावै रीझ रिझावै राधा प्यारी को।
यह छवि देख मगन भई मीरा, मोहन गिरधारी को॥

(अलका कारी=काली अलकें, रिझावै=प्रसन्न करते हैं)

4. हमे कैशी घोर उतारो

हमे कैशी घोर उतारो। द्रग आंजन सबही धोडावे।
माथे तिलक बनावे पेहरो चोलावे॥१॥
हमारो कह्यो सुनो बिष लाग्यो। उनके जाय भवन रस चाख्यो।
उवासे हिलमिल रहना हासना बोलना॥२॥
जमुनाके तट धेनु चरावे। बन्सीमें कछु आचरज गावे।
मीठी राग सुनावे बोले बोलना॥३॥
हामारी प्रीत तुम संग लागी। लोकलाज कुलकी सब त्यागी।
मीराके प्रभु गिरिधारी बन बन डोलना॥४॥

5. हृदय तुमकी करवायो

हृदय तुमकी करवायो। हूं आलबेली बेल रही कान्हा॥१॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे। मुरली क्यौं बजावे कान्हा॥२॥
ब्रिंदाबनमों कुंजगलनमों। गड उनकी चरन धुलाई॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। घर घर लेऊं बलाई॥४॥

6. हरि गुन गावत नाचूंगी

हरि गुन गावत नाचूंगी॥टेक॥
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥

7. हरि तुम कायकू प्रीत लगाई

हरि तुम कायकू प्रीत लगाई॥टेक॥
प्रीत लगाई पर दुःख दीनो। कैशी लाज न आई॥१॥
गोकुल छांड मथुराकु जावूं। वामें कौन बढाई॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। तुमकूं नंद दुवाई॥३॥

8. हरि तुम हरो जन की भीर

हरि तुम हरो जन की भीर।
द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥
भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर।
हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥
बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर।
दासि 'मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥
पाठांतर
हरि थें हर्या जण री भीर।।टेक।।
द्रोपता री लाल राख्याँ थें बढायाँ चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यां आप सरीर।
बूड़ताँ गजराज, राख्याँ, कट्याँ कुंजर भीर।
दासि मीरां लाल गिरधर, हराँ म्हारी भीर।।

(जन=भक्त, भीर=संकट, नरहरि=नृसिंह,
बूड़तां=डूबता हुआ, राख्यां=रक्षा की,
कुञ्जर=हाथी)

9. हरिनाम बिना नर ऐसा है

हरिनाम बिना नर ऐसा है। दीपकबीन मंदिर जैसा है॥टेक॥
जैसे बिना पुरुखकी नारी है। जैसे पुत्रबिना मातारी है।
जलबिन सरोबर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥१॥
जैसे सशीविन रजनी सोई है। जैसे बिना लौकनी रसोई है।
घरधनी बिन घर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥२॥
ठुठर बिन वृक्ष बनाया है। जैसा सुम संचरी नाया है।
गिनका घर पूतेर जैसा है। हरिनाम बिना नर ऐसा है॥३॥
कहे हरिसे मिलना। जहां जन्ममरणकी नही कलना।
बिन गुरुका चेला जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥४॥

10. हरि बिण क्यूँ जिवां री माय

हरि बिण क्यूँ जिवां री माय।।टेक।।
स्याम बिना बोराँ भयां, मण काठ ज्यूं घुण खाय।
मूल ओखद णा लग्याँ, म्हाणे प्रेम पीड़ा खाय।
मीण जल बिछुड़्या णा जीवाँ, तलफ मर मर जाय।
क्ँढताँ बण स्याम डोला, मुरलिया धुण पाय।
मीराँ रे प्रभु लाल गिरधर, वेग मिलश्यो आय।
(जिवां=जिवीत रहना, बोराँ=पागल, मूल=सच्ची,
ओखद=औषधि)

11. हरि बिन कूण गती मेरी

हरि बिन कूण गती मेरी।।टेक।।
तुम मेरे प्रतिपाल कहियै, मैं रावरी चेरी।
आदि अंत निज नाँव तेरो, हीया में फेरी।
बेरि बेरि पुकारि कहूँ, प्रभु आरति है तेरी।
थौ संसार विकार सागर, बीच में घेरी।
नाव फाटी प्रभु पाल बाँधो, बूड़त है बेरी।
बिरहणि पिवकी बाट जोवै, राखिल्यौ नेरी।
दासि मीरां राम रटत है, मैं सरण हूं तेरी।।

(कूण=कौन, गती=गति, प्रतिपाल=पालन
करने वाले, रावरी चेरी=तुम्हारी दासी, नाँव=
नाम, हीय=हृदय, बेरि-बेरि=बार बार, आरति=
आर्ति प्रबल इच्छा, बिकार=दुःख, बेरी=बेड़ा,
नांव, पिव की=प्रियतम की, नेरी=पास)

12. हरि बिन ना सरै री माई

हरि बिन ना सरै री माई।
मेरा प्राण निकस्या जात, हरी बिन ना सरै माई।
मीन दादुर बसत जल में, जल से उपजाई॥
तनक जल से बाहर कीना तुरत मर जाई।
कान लकरी बन परी काठ धुन खाई।
ले अगन प्रभु डार आये भसम हो जाई॥
बन बन ढूंढत मैं फिरी माई सुधि नहिं पाई।
एक बेर दरसण दीजे सब कसर मिटि जाई॥
पात ज्यों पीली पड़ी अरु बिपत तन छाई।
दासि मीरा लाल गिरधर मिल्या सुख छाई॥

(सरै=चलता है,पूरा होता है. दादुर=मेंढक,
लकरी=लकड़ी, अगन=अग्नि,आग, पात=
पत्ता, सुख छाई=आनन्द छा गया)

13. हरि मेरे जीवन प्राण अधार

हरि मेरे जीवन प्राण अधार।
और आसरो नांही तुम बिन, तीनू लोक मंझार।।

हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
आपबिना मोहि कछु न सुहावै निरख्यौ सब संसार।
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
मीरा कहै मैं दासि रावरी, दीज्यो मती बिसार।।
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
पाठांतर
हरि म्रा जीवन प्राण अधार ।।टेक।।
और आसिरो णा म्हारा थें बिण, तीनूं लोक मंझार।
थें बिण म्हाणे जग ण सुहावाँ, निरख्याँ पद संसार।
मीराँ रे प्रभु दासी रावली, लीज्यो णेक णिहार।।

(हरि=कृष्ण, जीवण=जीवन, अधार=आधार,सहारा,
आसिरो=ठिकाना, थें बिण=तुम्हारे बिना, निरख्याँ=
निरख लिया,देख लिया, णेक णिहार=तनिक देख लो,
रावली=आपकी,तुम्हारी)

14. हरि म्हारो सुणज्यो, अरज महाराज

हरि म्हारो सुणज्यो, अरज महाराज।
मैं अबल बल नाहिं, गोसाई; राखो अबके लाज।
रावरी होइ कणीरे जाऊँ, है हरि हिवडारो साज।
हयको वपु धरि दैते संघार्यो, सार्यों देवन को काज।
मीराँ के प्रभु और न कोई, तुम मेरे सिरताज।।

(अरज=बिनती, रावरी होई=तुम्हारी होकर,
कणी रे=कहाँ पर, हिवडारो=हृदय का, साज=
शोभा, हय=हयग्रीव, वपु=शरीर, दैत=दैत्य,
राक्षस, संघार्यो=मारा, सार्यौ=सिद्ध किया,
सिरताज=स्वामी)

15. हातकी बिडिया लेव मोरे बालक

हातकी बिडिया लेव मोरे बालक। मोरे बालम साजनवा॥टेक॥
कत्था चूना लवंग सुपारी बिडी बनाऊं गहिरी।
केशरका तो रंग खुला है मारो भर पिचकारी॥१॥
पक्के पानके बिडे बनाऊं लेव मोरे बालमजी।
हांस हांसकर बाता बोलो पडदा खोलोजी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर बोलत है प्यारी।
अंतर बालक यारो दासी हो तेरी॥३॥

16. हातीं घोडा महाल खजीना

हातीं घोडा महाल खजीना दे दवलतपर लातरे।
करीयो प्रभुजीकी बात सबदीन करीयो प्रभूजीकी बात॥टेक॥
मा बाप और बेहेन भाईं कोई नही आयो सातरे॥१॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर भजन करो दिन रातरे॥२॥

17. हारि आवदे खोसरी

हारि आवदे खोसरी। बुंद न भीजे मो सारी॥टेक॥
येक बरसत दुजी पवन चलत है। तिजी जमुना गहरी॥१॥
एक जोबन दुजी दहीकी मथीनया। तिजी हरि दे छे गारी॥२॥
ब्रज जशोदा राणी आपने लालकू। इन सुबहूमें हारी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। प्रभु चरणा पर वारी॥४॥

18. हारे जावो जावोरे जीवन जुठडां

हारे जावो जावोरे जीवन जुठडां। हारे बात करतां हमे दीठडां॥टेक॥
सौ देखतां वालो आळ करेछे। मारे मन छो मीठडारे॥१॥
वृंदावननी कुंजगलीनमें। कुब्जा संगें दीठ डारे॥२॥
चंदन पुष्पने माथे पटको। बली माथे घाल्याता पछिडारे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। मारे मनछो नीठडारे॥४॥

19. हारे मारे शाम काले मळजो

हारे मारे शाम काले मळजो। पेलां कह्या बचन पाळजो॥टेक॥
जळ जमुना जळ पाणी जातां। मार्ग बच्चे वेहेला वळजो॥१॥
बाळपननी वाहिली दासी। प्रीत करी परवर जो॥२॥
वाटे आळ न करिये वाहला। वचन कह्युं तें सुनजो॥३॥
घणोज स्नेह थयाथी गिरिधर। लोललज्जाथी बळजो॥४॥
मीरा कहे गिरिधर नागर। प्रीत करी ते पाळजो॥५॥

20. हूं जाऊं रे जमुना पाणीडा

हूं जाऊं रे जमुना पाणीडा। एक पंथ दो काज सरे॥टेक॥
जळ भरवुं बीजुं हरीने मळवुं। दुनियां मोटी दंभेरे॥१॥
अजाणपणमां कांइरे नव सुझ्यूं। जशोदाजी आगळ राड करे॥२॥
मोरली बजाडे बालो मोह उपजावे। तल वल मारो जीव फफडे॥३॥
वृंदावनमें मारगे जातां। जन्म जन्मनी प्रीत मळे॥४॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। भवसागरनो फेरो टळे॥५॥

21. हे माई म्हाँको गिरधरलाल

हे माई म्हाँको गिरधरलाल ।।टेक।।
थाँरे चरणाँ की आनि करत हों, और न मणि लाल।
नात सगो परिवारो सारो, मन लागे मानो काल।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, छबि लखि भई निहाल।।

(म्हाँको=हमारा, आनि करत हों=पूजा करती हूँ,
नात=नहीं तो, काल=मृत्यु, छवि=शोभा, निहाल=
प्रसन्न,सफल)

22. हे मा बड़ी बड़ी अँखियन वारो

हे मा बड़ी बड़ी अँखियन वारो, साँवरो मो तन हेरत हँसिके।।टेक।।
भौंह कमान वान बाँके लोचन, मारत हियरे कसिके।
जतन करो जन्तर लिखो बाँवा, ओखद लाऊँ घँसिके।
ज्यों तोकों कछु और बिथा हो, नाहिंन मेरो बसिके।
कौन जतन करों मोरी आली, चन्दन लाऊँ घँसिके।
जन्तर मन्तर जादू टोना, माधुरी मूरति बसिके।
साँवरी सूरत आन मिलावो, ठाढी रहूँ में हँसिके।
रेजा रेजा भेयो करेजा, अन्दर देखो घँसिके।
मीराँ तो गिरधर बिन दैखे, कैसे रहे घर बसिके।।

(हेरत=देखता है, हियरे हृदय पर, ओखद=औषधि,
आली=सखी, रेजा-रेजा=टुकड़े-टुकड़े)

23. हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री

हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री।

कैं कहुँ काज किया संतन का।
कैं कहुँ गैल भुलावना।।
हे मेरो मनमोहना।

कहा करूँ कित जाऊँ मेरी सजनी।
लाग्यो है बिरह सतावना।।
हे मेरो मनमोहना।।

मीरा दासी दरसण प्यासी।
हरि-चरणां चित लावना।।
हे मेरो मनमोहना।।

पाठांतर
हे मेरो मन मोहना। आयो नहीं सखीरी, हे मेरी ।।टेक।।
कै कहूँ काज किया संतन का, कै कहुं गैल भुलावना।
कहा करूँ कित जाऊं मोरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना।
मीराँ दासी दरसण प्यासी, हरि चरणाँ चित लावणा।

(गैल=मार्ग,राह)

24. हेरी मा नन्द को गुमानी

हेरी मा नन्द को गुमानी म्हाँरे मनड़े बस्यो।।टेक।।
गहे द्रुमडार कदम को ठाड़ो, मृदु मुसकाय म्हारी ओर हँस्यो।
पीताम्बर कट काछनी, काले रतन जटित माथे मुकुट कस्यो।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, निरख बदन म्हारो मनड़ो फँस्यो।।

(गुमानी=गर्वीला,घमंडी, मनड़े=मन में, द्रुम=वृक्ष,बदन=मुख)

25. हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।
घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।
जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय।
सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।
गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।
दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद सांवरिया होय।

पाठांतर
हेरी म्हां दरदे दिवाणी म्हारां दरद न जाण्याँ कोय।।टेक।।
घायल री गत घाइल जाण्यां, हिवड़ो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहरी जाणै, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मार्यां दर दर डोल्यां बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरां री प्रभु पीर मिटांगां जब बैद सांबरो होय।।

(दरदे दिवाणी=विरह के दुःख से पागल, अगण=
आग, जौहर=रत्न, वैद=वैद्य, साँवरो=कृष्ण)

26. हे री सखी देख्योरी नंद किशोर

हे री सखी देख्योरी नंद किशोर॥टेक॥
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल। पीतांबर झलक हरोल॥१॥
ग्वाल बाल सब संग जुलीने। गोवर्धनकी और॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरि भये माखन चोर॥३॥

27. हेली म्हाँसूं हरि बिनी रह्यो न जाय

हेली म्हाँसूं हरि बिनी रह्यो न जाय।।टेक।।
सास लड़ै मेरी नन्द खिजावै, राणा रह्या रिसाय।
पहरो भी राख्यो चौकी बिठार्यो, ताला दियो जड़ाय।
पूर्व जनम की प्रीत पुराणी, सो क्यूं छोड़ी जाय।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, अवरू न आवै म्हाँरी दाय।।

(हेली=सखि, खिजावै=चिढाती है, रिसाय=क्रोधित
होना, अवरू=दूसरा, दाय=पसन्द)

28. हैडा मामूनें हरीवर पालारे

हैडा मामूनें हरीवर पालारे। जाऊछूं जमनी तेमनीरे।
मुजे मारी कट्यारी। प्रेमनी प्रेमनीरे॥टेक॥
जल भरवासु गरवा गमाया। माथा घागरडी हमनारे॥१॥
बाजुबंद गोंडा बरखा बिराजे। हाथे बिटी छे हेमनीरे॥२॥
सांकडी शेरीमां वालोजी मी ज्याथी। खबर पुछुछुं खेमनीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। भक्ति करुछुं नित नेमनीरे॥४॥

29. हो कांनां किन गूँथी जुल्फां कारियां

हो कांनां किन गूँथी जुल्फां कारियां।।टेक।।
सुधर कला प्रवीन हाथन सूँ, जसुमति जू ने सबारियां।
जो तुंम आओ मेरी बाखरियां, जरि राखूँ चन्दन किवारियां।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, इन जुलफन पर वारियां।।

(कांनां=कृष्ण, जुल्फां=लटें, सुधर=सुन्दर, प्रवीन=प्रवीण,
निपुण, बाखरियां=मकान, जरि राखूँ=भली प्रकार बन्द
करके रखूँ, वारियाँ=न्यौछावर होती हूँ)

30. हो गये श्याम दूइज के चन्दा

हो गये श्याम दूइज के चन्दा।।टेक।।
मधुबन जाइ भये मधुबनिया, हम पर डारो प्रेम को फन्दा।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, अब तो नेह परो कछु मन्दा।।

(हो गये श्याम दूइज के चन्दा=जिस प्राकर द्वितिया
का चन्द्रमा थोड़ी देर दिखाई देकर फिर अद्दश्य हो
जाता है, उसी प्रकार कृष्ण कुछ दिन दर्शन देकर
अद्दश्य हो गये, मथुरा चले गये, मधुवन=मथुरा,
नेह=स्नेह,प्रेम)

31. हो जी हरि कित गये नेह लगाय

हो जी हरि कित गये नेह लगाय।।टेक।।
नेह लगाय मेरो मन हर लीयो, रस भरी टेर सुनाय।
मेरे मन में ऐसी आवै, मरूँ जहर बिस खाय।
छाड़ि गये बिसवासघात करि, नेह केरी नाव चढ़ाय।
मीराँ के प्रभु कबरे मिलोगे, रहे मधुपुरी छाय।।

(कित=कहां, नेह=स्नेह,प्रेम, रसभरी=मीठी-मीठी,
टेर=बात, मधपुरी=मथुरा)

32. होरी खेलत हैं गिरधारी

होरी खेलत हैं गिरधारी।

मुरली चंग बजत डफ न्यारो।
संग जुबती ब्रजनारी।।

चंदन केसर छिड़कत मोहन
अपने हाथ बिहारी।

भरि भरि मूठ गुलाल लाल संग
स्यामा प्राण पियारी।

गावत चार धमार राग तहं
दै दै कल करतारी।।

फाग जु खेलत रसिक सांवरो
बाढ्यौ रस ब्रज भारी।

मीरा कूं प्रभु गिरधर मिलिया
मोहनलाल बिहारी।।
पाठांतर
होरी खेलत हैं गिरधारी।।टेक।।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो, संग जुवति ब्रजनारी।
चन्दन केसर छिरकत मोहन, अपने हाथ बिहारी।
भरि भरि मूठि गुलाल लाल चहुँ, देत सबने पै डारी।
छैल छबीले नबल कान्ह संग स्यामा, प्राण प्यारी।
गावत चार धमार राग तेंह, दै दै कल करतारी।
फागु जू खेलत रसिक साँवरो बाढ्यो रस ब्रज भारी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, मोहन लाल बिहारी।।

(जुवति=युवति, नवल=नवयुवक, कल=सुन्दर,
करतारी=हाथों की तालियां, रस=आनन्द)

33. होरी खेलनकू आई राधा प्यारी

होरी खेलनकू आई राधा प्यारी हाथ लिये पिचकरी॥टेक॥
कितना बरसे कुंवर कन्हैया कितना बरस राधे प्यारी॥१॥
सात बरसके कुंवर कन्हैया बारा बरसकी राधे प्यारी॥२॥
अंगली पकड मेरो पोचो पकड्यो बैयां पकड झक झारी॥॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर तुम जीते हम हारी॥४॥

34. होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ

होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ घर आँगणां णा सुहावाँ।।टेक।।
दीपाँ चोक पुरावाँ हेली, पिया परदेस सजावाँ।
सूनी सेजाँ व्याल बुझायाँ जागा रेण बितावाँ।
नींद णेणा णा आवाँ।
कब री ठाढ़ी म्हा मग जोवाँ निसदिन बिरह जगावाँ।
क्यासूं मणरी बिथा बतावाँ, हिवड़ो रहा अकुलावाँ।
पिया कब दरस दखावां।
दीखा णां कोई परम सनेही, म्हारो संदेसाँ लावाँ।
वा बिरियां कब कोसी म्हारी हँस पिय कंठ लगावाँ।
मीराँ होली गावाँ।।

(भावाँ=अच्छा लगना, हेली=सखी, व्याल=साँप,
मणरी=मन की, बिथा=व्यथा, बिरियां=अवसर)

35. होली पिया बिन लागाँ री खारी

होली पिया बिन लागाँ री खारी।।टेक।।
सूनो गाँव देस सब सूनो, सूनी सेज अटारी।
सूनी बिरहन पिब बिन डोलें, तज गया पीव पियारी।
बिरहा दुख भारी।
देस बिदेसा णा जावाँ म्हारो अणेसा भारी।
गणताँ गणतां घिस गयाँ रेखाँ आँगरियाँ री सारी।
आयाँ णा री मुरारी।
बाजोयं जांझ मृदंग मुरलिया बाज्यां कर इकतारी।
आयां बसंत पिया घर णारी, म्हारी पीड़ा भारी।
श्याम क्याँरी बिसारी।
ठाँड़ी अरज करां गिरधारी, राख्यां लाल हमारी।
मीराँ रे प्रभु मिलज्यो माधो, जनम जनम री क्वाँरी।
मणे लागी सरण तारी।।

(खारी=फीकी,आनन्दहीन, अणेसा=अन्देसा,संशय,
क्वाँरी=अविवाहित)

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